Kalsarpa Yoga

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Kalsarpa defect is described various scriptures. Kalsarpa currently the subject of Yoga the heart of old AND new oracles consultation has already begun. If we Mansagri ancient texts; Vrihzzatk AND Vrihttjyotis overview of scripture, if it is proved that these texts have been mentioned about Kalsrpyog or Srpyog. Snakes have special importance Indian culture. Snake is God’s necklace. Seven days of the week named after the rough is placed above the planet’s name. But the name was not taken on the basis of Rahu Ketu; why the planet is supposed to shadow him. These effects have therefore indirectly. Sniwat nature of Rahu Ketu Mnglwat AND is assumed. Side of Rahu and Ketu Kaal Sarpa Yoga is formed by Rahu and Ketu is considered here as the effects of yoga is turned on. If the interpretation of scientifically Jnmang -ckr Kalsarpa yoga position of Rahu Ketu are always face to face. AND take effect when all the other planets in between Rahu Ketu then becomes inevitable impact of the properties of the defects. The left side is called the period of Rahu. Therefore Rahu Ketu from becoming part of the sum is the same Kalsarpa. Integrated manufacturing defect or some prenatal yoga Kalsarpa Pitridosh causes. Kalsarpa Byakrant need to be afraid of or not at all. Sometimes it is seen that Ddhwara astrologers have been so scared that she gets confused. Should refrain from such vendors today. Astrology is 12 sums. There is ascendant and 12 ‘, the base has a total of 12 types. Whose name follows –

1. Ananta kālasarpa yōga
2. Kulika
3. Vāsuki
4. Śaṅkhapāla
5. Padma
6. Mahāpadma
7. Takṣaka
8. Karkōṭaka
9. Śaṅkhacūṇḍa
10. Pātaka
11. Viṣākta
12. Śēṣanāga

 

कालसर्प योग

विविध धर्मग्रन्थों में कालसर्प दोष का वर्णन है। वर्तमान में प्राचीन एंव नवीन दैवज्ञों के मध्य कालसर्प योग के विषय में मंत्रणा शुरू हो चुकी है । यदि हम प्राचीन ग्रन्थ मानसागरी ;वृहज्जातक एंव वृहत्तज्योतिष शास्त्र का अवलोकन करे तो यह सिद्ध हो जाता है कि इन ग्रंथों में कालसर्पयोग अथवा सर्पयोग के बारे में उल्लेख किया गया है । भारतीय संस्कृति में नागों को विशेष महत्व है । नाग भगवान के गले का हार है । सप्ताह के सात दिनो के नाम पर किसी न किसी ग्रह के नाम ऊपर रखे गये है । किन्तु राहु केतु के आधार पर कोई नाम नही रखा गया ;क्यों की इन्हे छाया ग्रह माना जाता है । इसलिये इनका प्रभाव भी परोक्ष रूप से पड़ता है । राहु का स्वभाव शनिवत एंव केतु का मंगलवत माना जाता है । काल सर्प योग राहु से केतु ओर बनता है यहाँ विचारणीय यह है राहु से केतु की ओर बने योग का ही प्रभाव होता है। वैज्ञानिक रूप से यदि कालसर्प योग की ब्याख्या करें तो जन्मांग -चक्र में राहु केतु की स्थिति हमेशा आमने सामने की होती है । जब अन्य सभी ग्रह इनके मध्य एंव प्रभाव में आ जाते है तो राहु केतु के गुण दोषों का प्रभाव पड़ना अवश्यम्भावी हो जाता है । राहु का बांया भाग काल कहलाता है । इसलिये राहु से केतु की ओर बनने वाला योग ही कालसर्प है। कालसर्प योग का निर्माण किसी न किसी पूर्वजन्म कृत दोष या पितृदोष के कारण बनता है । कालसर्प से डरने या भयाक्रान्त होने की आवश्यकता बिल्कुल नही है । कभी कभी ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषियों के द्द्वरा इतना डरा दिया गया है कि वो भ्रमित हो जाता है । आज ऐसे दुकानदारों से बचना चाहिये । ज्योतिष में १२ राशियाँ होती है । और १२ लग्न होते है ‘इनके आधार पर कुल १२ प्रकार के होते है । जिनका नाम इस प्रकार है –

१.अनन्त कालसर्प योग
२.कुलिक ”
३.वासुकि ”
४.शंखपाल ”
५.पद्म ”
६.महापद्म ”
७.तक्षक ”
८.कर्कोटक ”
९.शंखचूंड ”
१०.पातक ”
११.विषाक्त ”
१२.शेषनाग ”

ग्रह गोचर में कुण्डली में जब जब कालसर्प बनता हो तो कुछ स्थान कालसर्प शान्ति के लिए है।

१.कालहस्ती शिवमन्दिर तिरुपति ।
२.त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंङ्ग नाशिक ।
३.त्रिवेणी संगम इलाहाबाद ।
४.त्रियुगी नारायण मन्दिर केदारनाथ ।
५.त्रिनागेश्वर मन्दिर जिला तन्जौर ।
६.शिद्धशक्ति पीठ काली पीठ कलकत्ता ।
७. गरुण गोविन्द छटीकरा वृन्दावन मथुरा u p ।
८.नाग मन्दिर ग्वारीघाट जबलपुर मध्य प्रदेश ।

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