Sheetla Ekadashi Vrat Katha – शीतला एकादशी व्रत कथा

Sheetla  Ekadashi Vrat Katha

कथा के अनुसार एक साहूकार था जिसके सात पुत्र थे। साहूकार ने समय के अनुसार सातों पुत्रों की शादी कर दी परंतु कई वर्ष बीत जाने के बाद भी सातो पुत्रों में से किसी के घर संतान का जन्म नहीं हुआ। पुत्र वधूओं की सूनी गोद को देखकर साहूकार की पत्नी बहुत दु:खी रहती थी। एक दिन एक वृद्ध स्त्री साहूकार के घर से गुजर रही थी और साहूकार की पत्नी को दु:खी देखकर उसने दु:ख का कारण पूछा। साहूकार की पत्नी ने उस वृद्ध स्त्री को अपने मन की बात बताई। इस पर उस वृद्ध स्त्री ने कहा कि आप अपने सातों पुत्र वधूओं के साथ मिलकर शीतला माता का व्रत और पूजन कीजिए, इससे माता शीतला प्रसन्न हो जाएंगी और आपकी सातों पुत्र वधूओं की गोद हरी हो जाएगी।

साहूकार की पत्नी तब माघ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (Magha Shukla Shasti tithi) को अपनी सातों बहूओं के साथ मिलकर उस वृद्धा के बताये विधान के अनुसार माता शीतला का व्रत किया। माता शीतला की कृपा से सातों बहूएं गर्भवती हुई और समय आने पर सभी के सुन्दर पुत्र हुए। समय का चक्र चलता रहा और माघ शुक्ल षष्ठी तिथि आई लेकिन किसी को माता शीतला के व्रत का ध्यान नहीं आया। इस दिन सास और बहूओं ने गर्म पानी से स्नान किया और गरमा गरम भोजन किया। माता शीतला इससे कुपित हो गईं और साहूकार की पत्नी के स्वप्न में आकर बोलीं कि तुमने मेरे व्रत का पालन नहीं किया है इसलिए तुम्हारे पति का स्वर्गवास हो गया है। स्वप्न देखकर साहूकार की पत्नी पागल हो गयी और भटकते भटकते घने वन में चली गईं।

वन में साहूकार की पत्नी ने देखा कि जिस वृद्धा ने उसे शीतला माता का व्रत करने के लिए कहा था वह अग्नि में जल रही है। उसे देखकर साहूकार की पत्नी चंक पड़ी और उसे एहसास हो गया कि यह शीतला माता है। अपनी भूल के लिए वह माता से विनती करने लगी, माता ने तब उसे कहा कि तुम मेरे शरीर पर दही का लेपन करो इससे तुम्हारे Šৠपर जो दैविक ताप है वह समाप्त हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने तब शीतला माता के शरीर पर दही का लेपन किया इससे उसका पागलपन ठीक हो गया व साहूकार के प्राण भी लट आये।